Thursday, October 14, 2010

एक गुब्‍बारा मेरा था


एक बच्‍चा
रोज घूमता नानू के साथ
रोज जाकर मेला देखता .
एक दिन उसने बैलून लिया
जो ऊपर उड जाता था
जब वह बच्‍चा यानी मैं, घर आया
और बैलून को ऊपर उडाया
वो छत पर जाकर चिपक गया
नानू ने उसे नीचे उतारा
फिर में रात में सो गया.
सुबह में जब मैं उठा
तो देखा कि बैलून नीचे पडा है
हवा उसकी सब निकल गई थी
बैलून हो गया था छोटा सा.

Thursday, February 11, 2010

एक और कविता

क्‍या होता गोल गोल
गोल गोल लड़डू
गोल गोल रोटी
गोल गोल अंडा,
गोल गोल पहिया
गोल गोल थाली
गोल गोल सीडी
गोल गोल बॉल
गोल गोल एप्‍पल
गोल गोल रुपया

मेरी कविता

सभी लोगों को मेरी ओर से नमस्‍ते
मैंने बहुत दिनों से आप लोगों से बात ही नहीं की, दरअसल मैं स्‍कूल के होमवर्क और पढाई में ही व्‍यस्‍त हो गया था, वैसे यह बात भी सही है कि मैंने उतनी कोशिश नहीं की जितनी करनी चाहिए थी। खैर छोडिए, अब मैं फिर लौट आया हूं और इस बीच मैंने कविताएं लिखनी भी शुरू की हैं, आज अपनी कुछ कविताएं आपका पढाता हूं।

टे़न की कविता
छुक'छुक करती आई ट़ेन,
अनूपपुर पहुंच गई
वहां पर रुक गई,
वहां पर थोड़े आदमी उतरे,
वहां से वो गई कटनी।